In English    

गाय गोबर में लक्ष्मी जी का निवास क्रमश:

गौवों ने कहा- “ देवी बात ठीक है,पर तुम बड़ी चंचल हो । कहीं भी जमकर रह ही नहीं सकती। फिर तुम्हारा सम्बंध भी बहुतों के साथ है। इसलिये हम को तुम्हारी इच्छा नही है तुम्हारा कल्याण हो । हमारा शरीर तो स्वभाव से हृष्ट, पुष्ट और सुन्दर है ,हमें तुमसे कोई काम नही है ।तुम्हारी जहाँ इच्छा हो जा सकती हो। तुमने हमसे बात-चीत की इस से हम अपने को कृतार्थ मानते हैं ।”
लक्ष्मी जी ने कहा – “गौवों तुम यह क्या कह रही हो ? मैं बड़ी दुर्लभ हूँ प्रिय साथी हूँ, पर तुम मुझे स्वीकार नही करती । आज मुझे यहां पता लगा कि ‘बिना बुलाये किसीके पास जाने से अनादर होता हैं’ यह कहावत सत्य है। उत्तम व्रताचरण , देवता,दानव्म गंधर्व, पिशाच,नाग, मनुष्य और राक्षस के बड़ी उग्र तपस्या करने पर कहीं मेरी सेवा का सौभाग्य प्राप्त कर पाते है । तुम मेरे इस प्रभाव पर ध्यान दो और मुझे स्वीकार करो ।देखो इस चराचर जगत में मेरा अपमान कोई भी नहीं करता । ”
गौवों ने कहा- “ देवी हम तुम्हारा अपमान नहीं करती । हम तो केवल त्याग कर रही हैं। सो भी इसलिये कि तुम्हारा चित्त चंचल है। तुम कहीं स्थिर हो के रहती नहीं। फिर हमलोग का शरीर तो स्वभाव से स्थिर है। अत: तुम जहाँ जाना चाहो चली जाओ । ”