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कामधेनु माता पौराणिक कथा- क्रमश:..

अत: राजा ने महर्षि से कामधेनु गाय माँगी। जब महर्षि ने कामधेनु देने में असमर्थता व्यक्त की बताया कि उन्हें कुछ समय तक कामधेनु की सेवा का अवसर मिला है। तब सहस्त्रार्जुन ने बल पूर्वक कामधेनु गाय को आश्रम से ले गया। इधर जब परशुराम आश्रम लौटे तब महर्षि ने उन्हें बताया कि सहस्त्रार्जुन कामधेनु को ले गया। परशुराम उसी क्षण सहस्त्रार्जुन के महल को गये और उसे कामधेनु लौटाने के लिये कहा। सहस्त्रार्जुन ने कहा –“मैं गाय वापस नहीं करूंगा और तुम कौन हो, वापस जाओ । मैं राजा हूँ, राजा का प्रजा के हर वस्तु पर अधिकार होता है। इसलिये वापस जाओ नहीं तो बंदी बनाकर कारागार में बंद कर दूंगा। ” ऊसने अपने सैनिकों को आदेश दे दिया, परशुराम को पकड़ने के लिये। परशुराम ने क्रोध में भरकर सभी सैनिकों को मार दिया। सहस्त्रार्जुन अपने सभी सैनिकों और पुत्रों सहित परशुराम से लड़ने लगा।
सहस्त्रार्जुन को दत्तात्रेय भगवान का आशीर्वाद प्राप्त था कि उसे पृथ्वी पर उसे कोई क्षत्रिय राजा हरा नहीं सकता एवं युद्ध के समय उसके हजारों हाथ होंगे। अत: वह अपने हजारों बाहु के साथ लड़ने लगा। परशुराम ने सहस्त्रार्जुन और उसके अधिकांश सैनिकों व पुत्रों को मार डाला। इसके बाद परशुराम कामधेनु को लेकर आश्रम लौट आये। महर्षि जमदग्नि ने कहा – “पुत्र तुमने एक राजा की हत्या करके ठीक नहीं किया। तुम्हें प्रायश्चित के लिये तीर्थ यात्रा पर जाना होगा।” तब परशुराम जी ने कहा- “वो मुझे बंदी बनाना चाहता था। तभी मैंने उससे युद्ध किया । उसने एक ब्राह्मण की गाय को जबरन छिना था। ऐसे भी वह अभिमानी, अहंकारी तथा अधर्मी हो चुका था।” इसके बाद परशुराम तीर्थ यात्रा पर चले गये।